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मंगलवार, 18 जुलाई 2017

आज भी गरीब के बच्चे अपना भविष्य तलाश रहे कूडों के ढेर मे

फतेहपुर, शमशाद खान । अतीत की नींव पर ही भविष्य का निर्माण होता है। समाज का प्रबुद्धजन ही नौनिहालों को प्रेरणा प्रदान करते हैं, परन्तु आज शासन-प्रशासन द्वारा बनायी जा रही नीतियों के कारण उल्टी गंगा बहना शुरू हो गयी है। सर्व शिक्षा अभियान हो या फिर पोलियो उन्मूलन प्रतिरक्षण अभियान बडो को नौनिहाल बच्चे ही पे्ररणा स्त्रोत के रूप में रैलियां निकाल कर संदेश दे रहे हैं कि वह अपने बच्चों को स्कूल भेजकर मातृ एवं पितृ दायित्वों का निर्वहन करें। जबकि जो भी बच्चे सरकारी प्राथमिक एवं जूनियर हाईस्कूलों में पढ रहे हैं यदि उनकी शिक्षा-दीक्षा पर गौर करें तो कक्षा एक से लेकर आठ तक के बच्चों को पढाने वाले शिक्षकों की संख्या कक्षाओं से भी आधी रहती है। दो-चार की संख्या मे शिक्षक पढाते कम हैं माध्यान्ह भोजन बनवाने में ही सारा समय गंवाते हैं। सुशिक्षित समाज ही विकास का मूल आधार है। अज्ञानता के अंधकार को मिटाने के लिए भारत सरकार सर्व शिक्षा अभियान चलाकर गांव-गलियारे एवं मलिन बस्ती के गरीब बच्चे जिनकी छह से चैदह वर्ष की उम्र है उन्हे स्कूल पहुंचाकर साक्षर करने के लिए करोडों रूपये खर्च करती है परन्तु यह अभियान भी वास्तव में जिला बेसिक शिक्षा विभाग की भ्रष्ट व्यवस्था के कारण सिर्फ फौरी प्रचार-प्रसार तक ही हर शिक्षा सत्र में यह अभियान सिमट कर रह जाता है। आज भी गांव-गलियारे के लड़के-लड़कियां बकरियां चराते हैं और शहर के दलित एवं मलिन बस्तियों के बच्चे कूड़ेदानी में कबाड एवं होटलों में कप-प्लेट तथा बस अड्डों में पान मसाला एवं खान-पान की वस्तुएं बेंचतें नजर आते हैं। जहां सर्व शिक्षा अभियान को सफल बनाने के लिए नवीन शिक्षा सत्र में स्कूली बच्चों की रैलियां निकालने, झण्डा, बैनर एवं पम्पलेट में भारी तादाद में धनराशि खर्च कराते हैं। वहीं बाल श्रमिकों को शिक्षित करने के लिए श्रम विभाग द्वारा भी विद्यालय संचालित है। लेकिन इन विद्यालयों में बाल श्रमिकों की संख्या ही रजिस्टर में दर्ज होती है। बाल श्रमिकों की शिक्षा-दीक्षा पूरी तरह से हवा-हवाई ही रहती है। ज्यादातर बाल श्रम विद्यालय के संचालक स्वयं सेवी संस्थाएं होती हैं। जिन्हे सरकारी धन डकारने एवं आला अधिकारियों की सेवाभाव करने में इन्हे विशेष दक्षता है। सरकारी प्राथमिक एवं जूनियर हाईस्कूल की शिक्षा व्यवस्था की बदहाली को शासन सत्ता का संचालन करने वाले सियासी नेता एवं आला अफसर भी जानते हैं जो इन गरीब बच्चों के विद्या मंदिर ही शिक्षण व्यवस्था को सुधार कम बल्मि अपनी कमाई का जरिया अवश्य समझते हैं। ज्यादातर इन विद्यालयों के भवन निर्माण में जनप्रतिनिधियों द्वारा निधि की धनराशि लाखों रूपयों की तादाद में आवंटित की जाती है। भवन का निर्माण भी होता है परन्तु पंचवर्षीय में ही यह स्कूल गरीब बच्चों की पाठशाला के साथ-साथ हर वक्त दुर्घटना की शंका अवश्य उनके दिलों-दिमाग में भर देती है। जो गरीब बच्चे स्कूल जाते हैं वह पढ़ने के उद्देश्य से कम बल्मि मध्यान्ह भोजन के लालच में अवश्य विद्यालय जाते हैं। इन सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारत, खराब विभाग व्यवस्था के कारण ही न तो कोई विधायक, सांसद व सम्पन्न तबके के लोग अपने बच्चों को नही पढाते। कानवेंट विद्यालयों एवं विदेशों में अपने बच्चों को पढाना उनकी शानेा शौकत में शामिल है। इसी कारण सरकारी प्राथमिक स्कूलों की शिक्षण व्यवस्था में सुधार नही हो पा रहा है और नही साक्षर भारत का सपना साकार हो पा रहा है। स्लोगन लिखी तख्तियां हाथों में लेकर वही गरीब बच्चे रैली निकालते हैं जिनके भाई-बहन बकरियां चराते हैं। कानवेन्ट स्कूलों के बच्चे शिक्षण अवधि में अध्ययन करने में लगे रहते हैं। उन्हे रैली निकालकर फिजुल का काम निश्चित ही उनके शिक्षण कार्य में बाधक बनेगी। 

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