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शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

साइबर जुस्तजू / कविता / कमलेश कुमार कमल


तुम खोयी नहीं हो, तुम हो कहीं 
अपनी वास्तविक दुनियाँ, के वर्चुअल कोने से 
मुझसे लुकाछुपी खेलती।

कभी यूँ ही घर का काम करती, दफ़्तर जाती
हाथ में मोबाईल उठा, मुझे ढूँढती, पकड़ती 
एक तरह का साईबर धप्पो, या फिर चोर-सिपाही खेलती। 

सच है कि मुमकिन नहीं, इतिहास को भूल पाना 
या खुद को ही झुठला देना, आखिर कहाँ होता है ?
ताल्लुकातों का पुराना छोर, दिल के कंगूरों में लिपटा 
कोई मकड़ी का जाला, कसम की एक झाड़ू 
जिसका बिखेर दे रेशा-रेशा। 

और, सच ये भी, कि तेरी इस साइबर जुस्तजू से 
निकल आती है, उम्मीदों की खिलखिलाती धूप
मेरे मन के क्षितिज्ञ पर।    

हठात् उड़ जाती है, बेकद्री, बेरूखी की यादें
भाप बनकर, और खिलने लगते हैं
अरमानों के नये गुलमोहर |

और, तुम सच बतलाना, कि घर की चकरघिन्नी में पिसते
या यूँ ही कभी, बिस्तर पर लेटे
नींद के पहले, के इस खेल में
तिर आते कि नहीं, लबों पर तबस्सुम
मेरे ही नाम का, और क्या सच ही 
कभी नहीं झरे, दुआओं के
हसरतों के, चंद हरसिंगार ?

आपका ही,
कमल 

2 टिप्‍पणियां:

  1. सादर आभार आलोक भैया ! यह एक कोशिश है ..दिलों को छूने की ।

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  2. आभार ! एक कोशिश की है दिलों को छूने की ।

    जवाब देंहटाएं

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